Saturday, 16 February 2019

दुब्रोव्स्की - 19


दुब्रोव्स्की- 19


ऊँघते हुए जंगल के बीचोंबीच एक सँकरे घास के मैदान में एक छोटा-सा ज़मीन का टुकड़ा था जिसमें एक टीला और एक गहरा बड़ा गड्ढा भी था, जिसके उस पार कुछ झोंपड़ियाँ और गड्ढे में घास-फूस से ढँकी कुछ रिहायशी कोठरियाँ थीं. 

आँगन में कई लोग थे, जिन्हें वेशभूषा की विविधता एवम् हथियारों से लैस होने के कारण पहचानना मुश्किल न था, वे डाकू थे. इस समय वे बगैर टोपियों के, एक बड़े बर्तन के चारों ओर बैठे हुए खाना खा रहे थे. टीले पर रखी एक छोटी तोप के निकट पहरेदार बैठा था, अपने पैर मोड़े हुए अपने कपड़ों में इतनी सफ़ाई से पैबन्द लगा रहा था, जिससे दर्जी की उत्तम कारीगरी का पता चलता था, वह हर घड़ी चारों ओर देख लेता था.

हालाँकि एक सुराही कई बार हाथोंहाथ उस जमघट में घूम चुकी थी, फिर भी यहाँ एक अजीब-सी ख़ामोशी छाई थी. डाकू खाना खा चुके, एक के बाद एक उठकर उन्होंने ईश्वर की प्रार्थना की, कुछ झोंपड़ियों में चले गए और कुछ जंगल में टहलते रहे या फिर वहीं विश्राम करने लगे.
पहरेदार ने अपना काम ख़त्म किया, अपने चीथड़े फेंके, पैबन्द की ओर देखकर ख़ुश हुआ, आस्तीन में सुई खोंसी और तोप की नली पर बैठकर उसने उदासी भरा एक पुराना गीत छेड़ दिया :

न मचा शोर, प्यारे हरे चीड़,
न सता, सोचने दे अपने मन की पीर.

इसी समय एक झोंपड़ी का किवाड़ खुला और सफ़ेद कपड़ा सिर पर बाँधे, सलीके से कपड़े पहनी हुई एक बुढ़ी देहलीज़ पर दिखाई दी. “बस हो गया, स्त्योप्का”, उसने क्रोधित होकर कहा, “मालिक सो रहे हैं, और तुम गला फ़ाड़ रहे हो, तुममें कुछ दया, कुछ विवेक है या नहीं!” “माफ़ करना, ईगरोव्ना”, स्त्योप्का ने जवाब दिया, “अच्छा, अब नहीं करूँगा! उसे, हमारे मालिक को, आराम करने दो और जल्दी से अच्छा हो जाने दो.” बुढ़िया चली गई और स्त्योप्का वहीं टीले पर चहल-कदमी करने लगा.
उस झोंपड़ी में, जहाँ से बुढ़िया बाहर निकली थी, दीवार के पीछे ज़ख़्मी दुब्रोव्स्की एक खटिया पर लेटा था. उसके सामने मेज़ पर उसकी पिस्तौलें पड़ी थीं, और ऊपर तलवार टँगी थी. यह झोंपड़ी महँगे कालीनों से सजी थी, कोने में एक चाँदी की सिंगार मेज़ रखी थी. दुब्रोव्स्की के हाथ में एक खुली किताब थी, मगर उसकी आँखें बन्द थीं. दीवार के दूसरी ओर से उसे देख रही बुढ़िया यह समझ नहीं पा रही थी कि वह सो रहा है, या सिर्फ गहरी सोच में डूबा है.

अचानक दुब्रोव्स्की सिहर उठा : साथ ही कुछ हलचल होने लगी और स्त्योप्का ने खिड़की से सिर घुसाकर अन्दर झाँका, “मालिक, व्लादीमिर अन्द्रेयेविच”, वह चिल्लाया, “हमारे लोग सन्देश दे रहे हैं, हमें ढूँढ़ा जा रहा है.” दुब्रोव्स्की खटिया से उछला, हथियार हाथ में पकड़े और झोंपड़ी से बाहर निकला. डाकू शोर मचाते हुए आँगन में इकट्ठे हो गए थे, उसके आते ही गहरा सन्नाटा छा गया.

“सब यहीं हैं?” दुब्रोव्स्की ने पूछा.

“सभी हैं, सिवा जासूसों के”, उसे जवाब मिला.

“अपनी-अपनी जगह!” दुब्रोव्स्की चिल्लाया, और डाकू अपने-अपने निश्चित स्थान पर खड़े हो गए. इसी समय तीन जासूस भागे-भागे दरवाज़े तक आए. दुब्रोव्स्की उनकी ओर बढ़ा. “क्या हुआ?” उसने पूछा.

“जंगल में सिपाही हैं,” उन्होंने जवाब दिया, “हमें घेर रहे हैं.”

दुब्रोव्स्की ने द्वार बन्द करने की आज्ञा दी, और स्वयम् तोप का निरीक्षण करने चला गया. जंगल में कई लोगों की आवाज़ें सुनाई दीं, जो नज़दीक आ रही थीं, डाकू ख़ामोशी से इंतज़ार कर रहे थे. अचानक तीन-चार सिपाही जंगल में दिखाई दिए और उन्होंने फ़ौरन गोलियाँ चलाकर अपने साथियों को जानकारी दी.

“लड़ाई की तैयारी करो,” दुब्रोव्स्की ने कहा और डाकुओं के मध्य एक सरसराहट दौड़ गई, जो शीघ्र ही शांत हो गई. तब निकट आते फ़ौजी दस्ते का शोर सुनाई दिया, पेड़ों के बीच हथियार चमक उठे, करीब पचास सिपाही जंगल से निकलकर टीले की ओर दौड़े. दुब्रोव्स्की ने गोला दाग़ा, जो निशाने पर लगा : एक का सिर उड़ गया, दो ज़ख़्मी हो गए. सिपाहियों में खलबली मच गई, मगर उनका अफ़सर आगे बढ़ा, सिपाही उसके पीछे-पीछे चलकर कुंज में घुसे, डाकुओं ने बन्दूकों से उन पर गोलियाँ चलाईं और हाथ में कुल्हाड़ियाँ लिए अपने टीले की रक्षा करने लगे, जिस पर उन्माद से भरे सिपाही चढ़े आ रहे थे, अपने पीछे गड्ढे में बीस ज़ख़्मी साथियों को छोड़कर. आमने-सामने लड़ाई होने लगी, सिपाही टीले पर पहुँच चुके थे, डाकू पीछे हटने लगे, मगर दुब्रोव्स्की अफ़सर के निकट गया और उसके सीने पर पिस्तौल रखकर चला दी, अफ़सर वहीं ढेर हो गया, कुछ सिपाही उसे हाथों पर उठाकर जंगल से बाहर ले गए, और अन्य सिपाही अपने मुखिया को खोकर वहीं रुक गए. डाकुओं ने, जिनकी हिम्मत बढ़ गई थी, इस मौके का फ़ायदा उठाया, उन्होंने उनका पीछा किया, उन्हें खाई में घेर लिया, वे भागे, डाकू चीख़ते हुए उनके पीछे भागे. विजय निश्चित हो चुकी थी. दुश्मन के सम्पूर्ण विनाश का इत्मीनान करके दुब्रोव्स्की अपने साथियों को छोड़कर बुर्ज़ में बन्द हो गया, उसने ज़ख़्मियों को उठाने की, पहरा दुगुना करने की आज्ञा दी, और सबसे कहा कि वे निकट ही रहें.

इन घटनाओं ने सरकार का ध्यान दुब्रोव्स्की के डाकों की तरफ़ आकर्षित किया. उसके निवास के बारे में जानकारी एकत्रित की गई. सिपाहियों का एक पूरा दस्ता भेजा गया, जिससे उसे ज़िन्दा या मुर्दा पकड़ा जा सकें. उसके गिरोह के कुछ सदस्यों को पकड़ लिया गया, और उनसे पता चला कि उनके बीच दुब्रोव्स्की नहीं है. उस मुठभेड़ के कुछ दिनों बाद उसने अपने सभी साथियों को बुलाया, उनसे कहा, कि वह हमेशा के लिए उन्हें छोड़कर जा रहा है, उन्हें भी अपने जीवन का ढंग बदलने की सलाह दी.

“मेरे नेतृत्व में तुम लोग काफ़ी धन कमा चुके हो, हरेक का व्यक्तित्व इस तरह का है, कि वह दूर-दराज़ के किसी प्रदेश में जाकर अपना जीवन ईमानदारी से बिता सकता है. मगर तुम सब लोग गुण्डागर्दी करने वाले हो और अपना यह काम छोड़ना नहीं चाहते”.

इतना कहकर एक को साथ लेकर उन्हें छोड़कर चला गया. कोई नहीं जानता कि वह कहाँ गया.

पहले तो इन सूचनाओं की सत्यता पर विश्वास नहीं किया गया : अपने सरदार के प्रति डाकुओं की समर्पण भावना विदित थी. यह सोच लिया गया कि वे उसे बचाना चाहते हैं. मगर बाद की घटनाओं ने उनके कथन की सत्यता को प्रमाणित किया: डाके, आगज़नी, लूटमार की घटनाएँ रुक गई थीं. रास्ते साफ़ हो गए. कुछ और सूत्रों से यह ज्ञात हुआ कि दुब्रोव्स्की विदेश में कहीं छिप गया है.

समाप्त

Friday, 15 February 2019

दुब्रोव्स्की - 18




अध्याय – 18

किरीला पेत्रोविच हॉल में चहलकदमी कर रहा था, हमेशा से अधिक ज़ोर से सीटी पर अपना गाना बजा रहा था; पूरे घर में हलचल थी, सेवक भाग रहे थे, नौकरानियाँ व्यस्त थीं, सराय में गाड़ीवान गाड़ी तैयार कर रहे थे, आँगन में लोग एकत्रित थे.
मालकिन के कमरे में, आईने के सामने नौकरानियों से घिरी एक महिला विवर्ण, निश्चल मारिया किरीलव्ना को सजा रही थी, उसका सिर हीरे-जवाहरात के बोझ से झुका जा रहा था, जब किसी का हाथ असावधानीवश उसे चुभ जाता तो वह रह-रहकर काँप जाती थी,  मगर वह मौन थी, ख़ाली-ख़ाली नज़रों से आईने में देख रही थी.
“जल्दी करो,” दरवाज़े के निकट किरीला पेत्रोविच की आवाज़ सुनाई दी.
“एक मिनट,” महिला बोली, “मारिया किरीलव्ना, उठिये, देख लीजिए, सब ठीक तो है?”
मारिया किरीलव्ना उठी, मगर बोली कुछ नहीं. दरवाज़ा खुला.
“दुल्हन तैयार है,” महिला किरीला पेत्रोविच से बोली, “गाड़ी में बैठाने की आज्ञा दीजिए.”

“ख़ुदा तुम्हारे साथ है,” किरीला पेत्रोविच ने जवाब दिया और मेज़ से येशू वाला सलीब उठाकर आर्त स्वर में कहा, “मेरे पास आओ, माशा, तुम्हें आशीर्वाद दूँ...” बेचारी लड़की पैरों पर गिर पड़ी और हिचकियाँ ले-लेकर रोने लगी.

“प्यारे पापा...पापा...” रोते हुए वह बोली और उसकी आवाज़ मानो जम गई. किरीला पेत्रोविच ने जल्दी-जल्दी उसे आशीर्वाद दिया, उसे उठाया और करीब-करीब हाथों में उठाकर गाड़ी में बिठा दिया. उसके साथ बैठी धर्ममाता और एक नौकरानी. वे चर्च की ओर चले. वहाँ दूल्हा उनका इंतज़ार कर रहा था. वह उनका स्वागत करने के लिए आगे बढ़ा और दुल्हन का विवर्ण मुख और विचित्र दशा देखकर स्तब्ध रह गया. वे साथ ही गए, सूने चर्च में, उनके पीछे दरवाज़े बंन्द कर दिए गए. पादरी बेदी के पीछे से निकला और उसने फ़ौरन आरम्भ कर दिया. मारिया किरीलव्ना कुछ भी नहीं देख रही थी, कुछ भी नहीं सुन रही थी, बस एक ही बात के बारे में सोच रही थी. सुबह से वह दुब्रोव्स्की का इंतज़ार कर रही थी. आशा ने एक पल के लिए भी उसका दामन न छोड़ा था. मगर जब पादरी हमेशा पूछे जाने वाले प्रश्न के साथ उसकी ओर मुख़ातिब हुआ, तो वह सिहर गई, जम गई, मगर फिर भी देर करती रही, अभी भी इंतज़ार करती रही; पुजारी ने उसके जवाब का इंतज़ार किए बगैर उन शब्दों का उच्चार कर दिया, जिन्हें लौटाया नहीं जा सकता.

विधि पूर्ण हो चुकी थी. उसने अप्रिय पति के ठण्डे चुम्बन का अनुभव किया, उसने सभी उपस्थितों की बधाइयाँ सुनीं और फिर भी विश्वास न कर सकी, कि उसका जीवन हमेशा के लिए कैद हो गया है, कि दुब्रोव्स्की उसे आज़ाद करने के लिए नहीं आया. राजकुमार उससे प्रेमभरे शब्द कह रहा था, वह उन्हें समझ नहीं रही थी, वे चर्च से बाहर निकले, ड्योढ़ी में पक्रोव्स्कोए से आए हुए किसानों का जमघट था. उसकी नज़र जल्दी से उन पर फिसलती हुई रुकी और दुबारा संज्ञाहीन हो गई. नव विवाहित दम्पत्ति एक साथ गाड़ी में बैठे और अर्बातवो की ओर चले, किरीला पेत्रोविच पहले ही वहाँ जा चुला था, जिससे कि वह दम्पत्ति का स्वागत कर सके.

जवान पत्नी के साथ अकेले रह जाने पर भी राजकुमार को उसकी ठण्डी नज़रों से कोई उलझन नहीं हो रही थी. उसने उसे कृत्रिम बातों और बेवकूफ़ीभरे मज़ाकों से बेज़ार करना बन्द कर दिया, उसके शब्द सीधे-सादे थे और उत्तर की मांग नहीं करते थे. इस तरह वे लगभग दस मील चले, कस्बे की सड़कों पर घोड़े बिल्कुल हिचकोले नहीं खा रहे थे और गाड़ी भी अपनी अंग्रेज़ी सीटों के कारण ज़रा भी हिचकोले नहीं खा रही थी.

अचानक पीछा करने वालों की चीख़ें सुनाई दीं, गाड़ी रुक गई, हथियारों से लैस व्यक्तियों के झुण्ड ने उसे घेर लिया, और नकाब पहने एक आदमी ने गाड़ी का उस तरफ़ का दरवाज़ा खोलकर, जहाँ युवा राजकुमारी बैठी थी, कहा, “आप आज़ाद हैं, बाहर निकलिए.”

“इसका क्या मतलब है?” राजकुमार चीख़ा. “तुम हो कौन?”

“यह दुब्रोव्स्की है,” राजकुमारी बोली.

राजकुमार ने समय सूचकता दिखाते हुए बगल वाली जेब से पिस्तौल निकाली और नकाबपोश को गोली मार दी. राजकुमारी चीख़ी और उसने दोनों हाथों से मुँह ढाँप लिया. गोली दुब्रोव्स्की के कन्धे पर लगी थी, खून दिखाई दे रहा था. राजकुमार ने एक भी क्षण खोए बिना दूसरी पिस्तौल निकाली, मगर उसे गोली चलाने का मौका नहीं दिया गया, दरवाज़े खुल गए और कुछ ताकतवर हाथों से उसे फ़ौरन गाड़ी से बाहर खींचकर उसके हाथ से पिस्तौल छीन लिया. उसके ऊपर अनेक चाकू चमचमा उठे.

“उसे छूना नहीं,” दुब्रोव्स्की चीख़ा और उसके उदास साथी पीछे हट गए.

“आप आज़ाद हैं,” दुब्रोव्स्की विवर्ण राजकुमारी की ओर मुख़ातिब होते हुए बोला.

“नहीं,” उसने जवाब दिया, “अब देर हो चुकी है, मेरी शादी हो चुकी है, मैं राजकुमार वेरेइस्की की पत्नी हूँ.”

“आप क्या कह रही हैं?” दुब्रोव्स्की बदहवासी से चीख़ा, “नहीं, आप उसकी पत्नी नहीं हैं, आप मजबूर थीं, आप इसके लिए कभी भी राज़ी न होतीं...”

“मैं राज़ी हो गई, मैंने वचन दे दिया,” उसने ज़बर्दस्त प्रतिवाद करते हुए कहा, “राजकुमार मेरा पति है, उसे आज़ाद करने का हुक्म दो और मुझे उसके साथ छोड़ दो. मैंने धोखा नहीं दिया है. मैं आख़िरी पल तक आपका इंतज़ार करती रही...मगर अब मैं आपसे कहती हूँ, अब देर हो चुकी है. हमें छोड़ दीजिए.”

मगर दुब्रोव्स्की को उसकी बातें सुनाई ही नहीं दे रही थीं, ज़ख़्म का दर्द और दिल की गहरी चोट ने मिलकर उसे शक्तिहीन बना दिया. वह पहिए के पास गिर पड़ा, डाकुओं ने उसे घेर लिया. वह उनसे कुछ ही शब्द कह पाया, उन्होंने उसे घोड़े पर बैठा दिया, दो डाकुओं ने उसे सहारा दिया, तीसरे ने घोड़े की लगाम पकड़ी और वे सब एक किनारे निकल गए, गाड़ी को रास्ते के बीच में छोड़कर, लोगों को बँधी हुई अवस्था में, घोड़ों को गाड़ी से अलग करके, मगर बिना कुछ लूटे और बिना ख़ून की एक भी बूँद बहाए, जो उन्हें अपने नायक के खून के बदले में बहानी चाहिए थी.

दुब्रोव्स्की - 17



अध्याय – 17

वह जागी और पहला ही ख़याल जो उसके मन में आया, वह था अपनी स्थिति की भयानकता का एहसास. उसने घंटी बजाई, नौकरानी आई और उसके प्रश्नों के उत्तर में बोली, कि किरीला पेत्रोविच शाम को अर्बातवो गए थे और देर रात गए वापस आए, और उन्होंने कड़े आदेश दिए हैं कि माशा को अपने कमरे से बाहर न निकलने दिया जाए और यह भी ध्यान रखा जाए कि कोई उससे बात न करने पाए; यह भी, कि घर में शादी की कोई ख़ास तैयारियाँ नहीं दिखाई दे रही हैं, सिवा इसके कि पादरी को आज्ञा दी गई है कि किसी भी बहाने से गाँव से बाहर न जाए. इन ख़बरों के बाद नौकरानी ने मारिया किरीलव्ना को अकेले छोड़ दिया और दुबारा दरवाज़ा बंद कर लिया.

उसके शब्दों ने कैद की गई युवती को क्रोधित कर दिया – उसका सिर गुस्से से मानो उबलने लगा, खून उत्तेजनापूर्वक बहने लगा, उसने इस सबकी ख़बर दुब्रोव्स्की को देने का निश्चय किया और सोचने लगी कि किस तरह उसकी अँगूठी ख़ास चीड़ के कोटर तक पहुँचाई जाए, इसी समय उसकी खिड़की पर एक छोटा-सा पत्थर गिया, शीशा झनझनाया और मारिया किरीलव्ना ने आँगन की ओर देखा तो वहाँ नन्हे साशा को पाया, जो उसकी ओर रहस्यमय इशारे कर रहा था. उसे अपने प्रति उसके लगाव का ज्ञान था और वह ख़ुश हो गई. उसने खिड़की खोली.

“नमस्ते, साशा”, उसने कहा, “मुझे क्यों बुला रहे हो?”
“मैं आपसे यह पूछने आया हूँ, बहना, कि आपको किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है. पापा बहुत गुस्से में हैं और उन्होंने घर में सबको आपकी बात सुनने से मना कर दिया है, मगर आपकी कोई इच्छा हो तो मुझे बताइए, मैं आपके लिए सब कुछ करूँगा.”
“धन्यवाद, मेरे प्यारे साशा, सुनो : तुम्हें कोटरवाला चीड़ मालूम है, जो कुंज के पास है?”
“मालूम है, बहना.”
“तो, अगर तुम मुझसे प्यार करते हो, तो जल्दी से वहाँ भागकर जाओ और कोटर में यह अँगूठी रख दो, हाँ, देखना, तुम्हें कोई देख न पाए.”
इतना कहकर उसने साशा की ओर अँगूठी फेंक दी और खिड़की बंद कर ली.

बच्चे ने अँगूठी उठाई और पूरी रफ़्तार से दौड़ा और तीन ही मिनट में नियत स्थल पर पहुँच गया. यहाँ वह रुका, गहरी साँसें लेते हुए चारों ओर देखा और अँगूठी को कोटर में रख दिया. काम सही-सलामत पूरा करने के बाद वह उसी समय उसकी सूचना मारिया किरीलव्ना को देना चाहता था, मगर अचानक भूरे बालों वाला, भेंगी आँखोंवाला, खरोंचों से भरा बालक कुंज के नीचे से चीड़ के पेड़ तक आया और उसने कोटर में हाथ डाल दिया. साशा गिलहरी-सी फुर्ती से उस पर झपटा और उसके दोनों हाथों से लिपट गया.

“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” उसने गरजते हुए कहा.
“तुम्हें इससे क्या?” बालक ने स्वयम् को छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा.
“यह अँगूठी छोड़ो, भूरे ख़रगोश!” साशा चीख़ा, “वरना मैं तुम्हें अपने तरीके से सबक सिखाऊँगा.”
जवाब देने के बदले उसने उसके चेहरे पर मुट्ठी तानकर मारी, मगर साशा ने उसे नहीं छोड़ा और ज़ोर से चीख़ा, “चोर, चोर, यहाँ, यहाँ आओ...”

बालक उससे छिटकने की कोशिश कर रहा था. वह साशा से दो वर्ष बड़ा था और उससे काफ़ी ताकतवर भी था, मगर साशा फुर्तीला था. कुछ मिनटों तक वे लड़ते रहे, आख़िरकार भूरा बालक उस पर भारी पड़ा. उसने साशा को ज़मीन पर पटक दिया और उसका गला पकड़ लिया.

मगर उसी समय एक मज़बूत हाथ ने उसके भूरे, उलझे हुए बालों को पकड़ कर खींचा और माली स्तिपान ने उसे ज़मीन से ऊपर उठाया.

“आह, तुम, भूरे शैतान!” माली बोला, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई छोटे मालिक को मारने की...”
साशा उछल कर संभल गया था.

“तुमने मुझे ज़बर्दस्ती पकड़ लिया,” उसने कहा, “वर्ना तुम मुझे गिरा न पाते. अँगूठी दे दो और दफ़ा हो जाओ.”
“बिल्कुल नहीं,” भूरे बालक ने जवाब दिया और अचानक अपनी जगह पर पलटी खाकर स्तिपान के हाथ से अपने बाल छुड़ा लिए. अब वह भागने ही वाला था, कि साशा ने उसे पकड़ लिया, पीठ को धक्का दिया और बच्चा चारों ख़ाने चित गिर गया, माली ने उसे दुबारा पकड़ लिया और उसके हाथ-पैर बाँध दिए.
“अँगूठी दो,” साशा चिल्लाया.
“रुको, मालिक.” स्तिपान ने कहा, “हम इसका फैसला हरकारे से करवाएँगे.”

माली कैदी को मालिक के आँगन में ले आया, साशा साथ-साथ चला, वह परेशानी से अपनी सलवार को देख लेता जो फट गई थी, और जिस पर हरी काई चिपक गई थी. अचानक तीनों किरीला पेत्रोविच के सामने पड़े, जो अपने अस्तबल का निरीक्षण करने आ रहा था.

“यह क्या है?” उसने स्तिपान से पूछा. स्तिपान ने संक्षेप में सारी घटना सुनाई. किरीला पेत्रोविच ने बड़े ध्यान से उसकी बात सुनी.
“तुम, शैतान,” वह साशा की ओर मुड़कर बोला, “तुम उससे उलझे क्यों?”
“उसने कोटर से अँगूठी चुराई! पापा, उससे कहिए कि वह अँगूठी वापस करे.”
“कौन-सी अँगूठी? कौन-सा कोटर?”
“वो मुझे मारिया किरीलव्ना...वो, अँगूठी...”

साशा घबरा गया, गड़बड़ा गया. किरीला पेत्रोविच ने नाक-भौंह चढ़ा लिए और सिर हिलाते हुए बोला:
“यहाँ मारिया किरीलव्ना बीच में कहाँ से आ गई? सारी बात सच-सच बता दो, वर्ना तुम्हें चाबुक से इतना मारूँगा कि तुम किसी को पहचानोगे भी नहीं.”
“ऐ ख़ुदा, पापा, मेरे प्यारे पापा...मुझे मारिया किरीलव्ना ने कुछ भी नहीं कहा, पापा.”
“स्तिपान, जाओ तो, बर्च के पेड़ की पतली टहनी तो तोड़ लाओ...”
“रुकिए पापा, मैं आपको सब बता दूँगा. आज मैं आँगन में भाग-दौड़ कर रहा था, और बहना, मारिया किरीलव्ना ने खिड़की खोली, और मैं खिड़की के निकट भागा और बहना ने जानबूझ कर अँगूठी नीचे नहीं गिराई, और मैंने उसे कोटर में छुपा दिया...और...और यह भूरा अँगूठी चुराना चाहता था.”
“जानबूझ कर नहीं गिराई, और तुम छुपाना चाहते थे...स्तिपान, छड़ी लाओ!”
“पापा, प्यारे, रुकिए, मैं सब बता दूँगा. बहना मारिया किरीलव्ना ने मुझे चीड़ के पेड़ तक दौड़कर जाने और उसके कोटर में अँगूठी रखने के लिए कहा, मैं भाग कर गया और अँगूठी रख दी, और यह बदमाश...”

किरीला पेत्रोविच बदमाश बालक की ओर मुड़ा और गरज कर उससे पूछा, “किसके हो तुम?”
“मैं दुब्रोव्स्की महाशय का कृषिदास हूँ,” भूरे बालक ने जवाब दिया.
किरीला पेत्रोविच का चेहरा काला पड़ गया.
“तुम, शायद, मुझे अपना मालिक नहीं मानते, ठीक है”, उसने जवाब दिया. “मगर तुम मेरे बाग में क्या कर रहे थे?”
“खुबानियाँ चुरा रहा था, “ बालक ने बड़ी उदासीनता से जवाब दिया.
“अहा, नौकर भी मालिक पर ही गया है: जैसा पादरी वैसा चाकर, और खुबानियाँ क्या मेरे चीड़ के पेड़ पर लगती हैं?”
बच्चा कुछ नहीं बोला.
“पापा, उससे कहिए, अँगूठी वापस करे”, साशा बोला.
“चुप करो, अलेक्सान्द्र,” किरीला पेत्रोविच ने जवाब दिया, “भूलो मत कि तुमसे मुझे अभी निपटना है. अपने कमरे में जाओ. तुम, भेंगे, तुम मुझे दोषी नहीं मालूम होते. अँगूठी दे दो और घर चले जाओ.”
बच्चे ने मुट्ठी खोली और दिखाया कि उसके हाथ में अँगूठी नहीं है.
“अगर तुम सारी बात सच-सच बता दो, तो मैं तुम्हारी खाल नहीं खिंचवाऊँगा, बल्कि अख़रोट के लिए पाँच कोपेक भी दूँगा. वर्ना, मैं तुम्हारे साथ वह करूँगा, जिसकी तुम उम्मीद भी नहीं करते होगे. तो?”

बालक ने एक भी शब्द नहीं कहा और सिर झुकाए खड़ा रहा, बेवकूफ़ी का भाव चेहरे पर लाते हुए.
“ठीक है,” किरीला पेत्रोविच ने कहा, “इसे कहीं बन्द कर दिया जाए और यह ध्यान रखा जाए, कि वह भागे नहीं, वर्ना पूरे घर की खाल खिंचवा लूँगा.
स्तिपान बालक को कबूतरख़ाने में बन्द कर आया, बाहर से ताला लगा दिया और पंछियों की देखभाल करने वाली बूढ़ी अगाफ़िया को पहरे पर बिठा दिया.

“अभी शहर से पुलिस कप्तान को बुलाया जाए,” किरीला पेत्रोविच ने बालक को आँखों से बिदा करते हुए कहा, “हाँ, जितनी जल्दी हो सके.”
शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है. उसने पापी दुब्रोव्स्की के साथ सम्पर्क बनाए रखा है. मगर क्या सचमुच उसने उसे मदद के लिए बुलाया है?’ किरीला पेत्रोविच कमरे में चहलकदमी करते हुए सोच रहा था और बड़े गुस्से में सीटी पर “विजय भेरी...” बजाता जा रहा था.
हो सकता है, मुझे उसका ताज़ा सुराग़ मिल जाए, और अब वह हमसे बच न पाए. हम इस मौके का फ़ायदा उठाएँगे. च् च् ! घण्टी...ख़ुदा का शुक्र है, यह कप्तान है.”
“ऐ...पकड़े हुए बच्चे को यहाँ लाओ.”

अब तक गाड़ी आँगन में प्रवेश कर चुकी थी और हमारा परिचित कप्तान कमरे में घुसा, पूरी तरह धूल-धूसरित.
“अच्छी ख़बर है”, किरीला पेत्रोविच ने उससे कहा, “मैंने दुब्रोव्स्की को पकड़ लिया है.”
“ख़ुदा का शुक्र है, हुज़ूर,” कप्तान ने ख़ुश होते हुए कहा, “कहाँ है वह?”
“मतलब, दुब्रोव्स्की को नहीं, बल्कि उसके गिरोह के एक सदस्य को. अभी उसे लाएँगे. वह मदद करेगा हमारी उनके नायक को पकड़ने में. देखिए, उसे ले आए हैं.”

कप्तान, जो एक खूँखार डाकू को देखने की उम्मीद कर रहा था, तेरह वर्षीय दुबले-पतले बालक को देखकर आश्चर्यचकित रह गया. उसने अविश्वास से किरीला पेत्रोविच की ओर देखा और स्पष्टीकरण का इंतज़ार करने लगा. किरीला पेत्रोविच ने फ़ौरन सुबह की घटना का वर्णन करना आरंभ कर दिया, हाँ, मारिया किरीलव्ना का ज़िक्र उसने नहीं किया.

कप्तान बड़े ध्यान से उसकी बात सुन रहा था, हर पल उस नन्हे दुष्ट की ओर नज़र डाल लेता, जो बेवकूफ़ी का मुखौटा पहने उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा था.
“हुज़ूर, आपसे अकेले में बात करने की इजाज़त दीजिए,” अन्त में कप्तान ने कहा.
किरीला पेत्रोविच उसे दूसरे कमरे में ले गया और उसने दरवाज़ा बन्द कर लिया.

आधे घण्टे बाद वे वापस हॉल में आए, जहाँ कैदी अपने भाग्य की प्रतीक्षा कर रहा था.
“मालिक,” कप्तान ने उससे कहा, “चाहते थे कि तुम्हें शहर की जेल में डाल दिया जाए, कोड़े बरसाए जाएँ तुम पर, फिर तुम्हें कैदियों की बस्ती में भेज दिया जाए, मगर मैंने तुम्हारी सिफ़ारिश करके तुम्हें आज़ाद करवा दिया है. उसे खोल दिया जाए.”
बच्चे को बन्धनमुक्त कर दिया गया.
“मालिक को धन्यवाद दो’, कप्तान ने कहा. बच्चे ने किरीला पेत्रोविच के पास जाकर उसका हाथ चूम लिया.
“अपने घर भाग जा,” किरीला पेत्रोविच ने उससे कहा, “और आगे से कोटरों से खुबानियाँ न चुराना.”

बच्चा बाहर निकला, प्रसन्नतापूर्वक ड्योढ़ी से कूदा और भाग चला, बिना इधर-उधर देखे, खेतों से होते हुए किस्तेनेव्को की ओर. गाँव के निकट आने पर वह आधी टूटी झोंपड़ी के निकट रुका, जो सीमा से लगी हुई थी, और खिड़की पर खटखट करने लगा. खिड़की का पल्ला ऊपर उठा और एक बुढ़िया दिखाई दी.
“नानी, रोटी”, बच्चा बोला, “मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया है, भूख से मरा जा रहा हूँ.”
“आह, यह तुम हो, मोत्या, तुम कहाँ गायब हो गए थे, शैतान,” बुढ़िया ने जवाब दिया.
“बाद में बताऊँगा नानी, ख़ुदा के लिए रोटी दो.”
“अन्दर तो आ.”
“जल्दी में हूँ, नानी मुझे अभी एक और जगह भागना है. रोटी, ख़ुदा के लिए, रोटी!”
“कैसा बेसब्रा है,” बुढ़िया भुनभुनाई, “ले, यह ले टुकड़ा”, और उसने खिड़की से काली डबलरोटी का टुकड़ा दे दिया. बच्चा गबागब उसे खाने लगा और चबाते-चबाते ही पल भर में आगे भाग चला.

अँधेरा घिरने लगा था. वह आँगनों एवम् भट्टियों के मध्य से गुज़रता हुआ किस्तेनेव्को के जंगल की ओर भाग रहा था. दो पाइन वृक्षों के निकट आकर, जो द्वारपाल की भाँति जंगल के आरम्भ में खड़े थे, वह रुका, फिर चारों ओर देखकर एक कर्णभेदी सीटी बजाने लगा और बीच-बीच में कुछ सुनने भी लगता, जवाब में उसे एक हल्की और लम्बी सीटी सुनाई दी, जंगल से कोई बाहर निकला और उसके निकट आने लगा.